शिमला । सर्दियों में पशुओं के लिए चारे का पर्याप्त भंडारण करने के उद्देश्य से इन दिनों जुन्गा क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में घास कटाई का कार्य युद्धस्तर पर चला हुआ है। ग्रामीण महिलाएं सुबह से शाम तक घासनियों में घास काटने और उसे एकत्रित करने में जुटी हैं, ताकि आगामी चार महीनों के दौरान बर्फबारी और बारिश के कारण चारे की कमी न हो।
घास कटाई के पारंपरिक कार्य में अब ग्रास कटिंग मशीनों का भी इस्तेमाल होने लगा है। इससे विशेषकर महिलाओं को काफी राहत मिल रही है। हालांकि, मशीन से घास काटने के बाद उसे बांधने और ढोने का काम अभी भी काफी हद तक महिलाओं को ही करना पड़ता है। किसानों का कहना है कि मशीन से कटाई करने पर घास की गुणवत्ता और कटाई का तरीका पारंपरिक दराती की तुलना में कुछ अलग रहता है।

प्रगतिशील किसान दया राम वर्मा, दौलत राम मेहता और प्रीतम सिंह ठाकुर ने बताया कि अक्तूबर और नवंबर के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों की व्यस्तता काफी बढ़ जाती है। इस समय घास कटाई के साथ मक्की और दलहन की फसलों को समेटने का काम भी किया जाता है। ग्रामीण महिलाएं सुबह होते ही दोपहर का भोजन साथ लेकर घासनियों का रुख कर लेती हैं और दिनभर घास काटने में जुटी रहती हैं।
उन्होंने बताया कि अतीत में गांव की महिलाएं एक-दूसरे की घास काटने में सामूहिक रूप से सहयोग करती थीं। स्थानीय भाषा में इस परंपरा को ‘गसाई’ अथवा ‘नलाई’ कहा जाता है। इस दौरान महिलाएं बारी-बारी से एक-दूसरे के खेतों और घासनियों में काम करती थीं। घास काटते समय पहाड़ी गीत गाने, आपसी बातचीत करने और विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर चर्चा करने का भी अवसर मिलता था। इस परंपरा से आपसी भाईचारे और सामूहिक सहयोग की भावना मजबूत होती थी। हालांकि, अब मशीनों के बढ़ते इस्तेमाल से घास कटाई के पारंपरिक तौर-तरीकों में बदलाव आ रहा है।
ग्रामीण महिलाओं की मेहनत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे घास और लकड़ी का डेढ़ से दो मन तक का बोझ पीठ पर उठाकर कई किलोमीटर दूर से घर तक पहुंचाती हैं। घर पहुंचाने के बाद घास को एक निर्धारित स्थान पर इकट्ठा करके सुरक्षित रखा जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘गोमट’ कहा जाता है। गोमट में व्यवस्थित ढंग से रखा गया घास बारिश के दौरान भी भीतर से सूखा रहता है और सर्दियों में पशुओं के चारे के काम आता है।














