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1.2 लाख से अधिक विद्यार्थियों को उपाधियां प्रदान …

नई दिल्ली। उपराष्ट्रपति एवं दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलाधिपति सी. पी. राधाकृष्णन ने आज दिल्ली विश्वविद्यालय के 102वें दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में भाग लिया और 1.2 लाख से अधिक स्नातकों को उपाधियां प्रदान कीं। सभा को संबोधित करते हुए, उपराष्ट्रपति ने विश्वविद्यालय की 104 वर्षों की उल्लेखनीय यात्रा और शैक्षणिक उत्कृष्टता एवं निरंतरता के प्रति इसकी अटूट प्रतिबद्धता की सराहना की।

इसकी ऐतिहासिक विकास गाथा का उल्लेख करते हुए, उन्होंने बताया कि इस विश्वविद्यालय की शुरुआत मात्र तीन कॉलेजों, दो संकायों, आठ विभागों, उपहार स्वरूप प्राप्त पुस्तकों के एक छोटे से पुस्तकालय और 750 विद्यार्थियों के साथ हुई थी। आज इसमें 16 संकाय, 86 विभाग, 90 कॉलेज, 20 छात्रावास, 30 से अधिक केन्द्र एवं संस्थान, 34 पुस्तकालय और छह लाख से अधिक विद्यार्थी हैं। उन्होंने कहा, “दिल्ली विश्वविद्यालय ने अपनी ऐतिहासिक यात्रा में वास्तव में एक लंबी दूरी तय की है।”

इस समारोह की भव्यता की सराहना करते हुए, उपराष्ट्रपति ने कहा कि स्नातक होने वाले विद्यार्थियों की कुल संख्या कई देशों की कुल जनसंख्या से अधिक है। यह तथ्य इस विश्वविद्यालय के व्यापक शैक्षणिक प्रभाव को दर्शाता है।

इस विश्वविद्यालय को भारत के सबसे प्रतिष्ठित उच्च शिक्षा संस्थानों में से एक बताते हुए, उपराष्ट्रपति ने कहा कि एक सदी से अधिक समय से इसने ऐसी प्रतिभाओं को निखारा है जिन्होंने भारत के बौद्धिक, राजनीतिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक जीवन का नेतृत्व किया है। उन्होंने स्नातकों से कहा कि वे अब उन प्रतिभाशाली पूर्व छात्रों की परंपरा में शामिल हो रहे हैं, जिन्होंने न केवल भारत बल्कि विश्व को भी आकार दिया है।

इस विश्वविद्यालय की बढ़ती शैक्षणिक प्रतिष्ठा पर प्रकाश डालते हुए, उन्होंने इसकी राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में लगातार हो रहे सुधार पर संतोष व्यक्त किया। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय ने क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग में लगातार चार वर्षों तक भारतीय विश्वविद्यालयों में पहला स्थान कायम रखा है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि यह दीक्षांत समारोह महज एक औपचारिक कार्यक्रम भर नहीं है; यह एक अंत और एक नई शुरुआत, दोनों का प्रतीक है। यह वर्षों के अध्ययन, अनुशासन, मित्रता, परीक्षाओं और आत्म-खोज का उत्सव है। साथ ही, यह स्नातकों के लिए एक व्यापक क्षेत्र, यानी उत्तरदायित्व के क्षेत्र में औपचारिक प्रवेश का संकेत भी है।

उन्होंने कहा कि स्नातक एक ऐसी दुनिया में कदम रख रहे हैं जो व्यापक परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। प्रौद्योगिकी उद्योगों को नया रूप दे रही है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता कार्य की प्रकृति को नए सिरे से परिभाषित कर रही है, जलवायु परिवर्तन विकास के प्रतिमानों को चुनौती दे रहा है और विश्व भर में लोकतंत्र की परीक्षा हो रही है। उन्होंने कहा कि ऐसी दुनिया में, उपाधि मात्र एक प्रमाण पत्र नहीं, बल्कि एक प्रतिबद्धता है, समाज की सेवा करने की प्रतिबद्धता, अपने कौशल का उपयोग व्यापक भलाई के लिए करने की प्रतिबद्धता, सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि राष्ट्र के कल्याण के लिए जीने की प्रतिबद्धता और सबसे बढ़कर, “राष्ट्र प्रथम” के सिद्धांत को कायम रखने की प्रतिबद्धता।

विकसित भारत @2047 की दिशा में देश की यात्रा का उल्लेख करते हुए, उपराष्ट्रपति ने कहा कि इस महत्वपूर्ण मोड़ पर युवाओं की भूमिका और भी अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व और दूरदृष्टि में भारत ने आत्मनिर्भर भारत बनने और 2047, जब देश अपनी आजादी की 100वीं वर्षगांठ मनाएगा, तक एक विकसित भारत का निर्माण करने की आकांक्षा व्यक्त की है।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आत्मनिर्भरता का अर्थ नवाचार, उत्पादन, अनुसंधान और भारतीय परिस्थितियों पर आधारित ऐसे समाधानों को विकसित करने की क्षमता है, जो वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी हों। यह विश्वविद्यालयों से अनुसंधान, उद्यमिता और स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों का वाहक बनने का आह्वान करता है। उन्होंने आगे कहा कि विकसित भारत का अर्थ समावेशी विकास, तकनीकी क्षेत्र में नेतृत्व, सामाजिक सद्भाव, पर्यावरणीय स्थिरता और पारदर्शी एवं जवाबदेह संस्थाएं है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विकास अंतिम नागरिक तक पहुंचे और अवसर सभी के लिए एक वादा बन जाए।

इस परिकल्पना के शिल्पकार के रूप में स्नातकों को संबोधित करते हुए, उपराष्ट्रपति ने कहा कि चाहे वे वैज्ञानिक बनें, सिविल सेवक बनें, उद्यमी बनें, कलाकार बनें, वकील बनें, शिक्षक बनें या नवोन्मेषक बनें, वे 2047 के भारत को आकार देंगे। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत के लक्ष्य की प्राप्ति उनकी ईमानदारी, योग्यता, करुणा और नवोन्मेषी भावना पर निर्भर करेगी।

उपराष्ट्रपति ने इस बात पर प्रसन्नता जताई कि स्नातकों में 50 प्रतिशत से अधिक और स्वर्ण पदक विजेताओं में 70 प्रतिशत से अधिक महिलाएं हैं। उन्होंने इस बात का भी उल्लेख किया कि इस वर्ष उपाधि प्राप्त करने वाली महिलाओं की संख्या पुरुषों से अधिक है। उन्होंने इसे देश में महिला शिक्षा के क्षेत्र में हो रही अभूतपूर्व प्रगति का सबूत बताया। उन्होंने सभी स्नातकों को उनकी निरंतर मेहनत से हासिल इस सफलता के लिए आशीर्वाद और शुभकामनाएं दीं।

अपने संबोधन का समापन करते हुए, उपराष्ट्रपति ने स्नातकों से जिज्ञासा की भावना को आगे बढ़ाने और इस बात को याद रखने का आग्रह किया कि सीखना एक आजीवन प्रक्रिया है। उन्होंने विद्यार्थोयों से हासिल अवसरों के लिए आभारी रहने और उनसे जुड़ी जिम्मेदारियों के प्रति सचेत रहने का आह्वान किया। उन्होंने उनसे “नशीले पदार्थों से बचने” और सोशल मीडिया का गुलाम बनने के बजाय उसका रचनात्मक उपयोग करने का भी आग्रह किया।

इस दीक्षांत समारोह में दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर योगेश सिंह, संकाय सदस्य, अन्य गणमान्य व्यक्ति और विद्यार्थी उपस्थित थे।

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