]> पालि केवल बौद्ध धर्मग्रंथों की भाषा भर नहीं है, बल्कि यह भारत की प्राचीन बौद्धिक एवं सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। तिपिटक सहित पालि साहित्य में दर्शन, नैतिकता, मानव जीवन, समाज और ज्ञान की ऐसी समृद्ध परंपरा सुरक्षित है, जिसका भारतीय इतिहास और संस्कृति के अध्ययन में विशेष महत्व है। पालि पखवाड़ा इसी विरासत को नई पीढ़ी से जोडऩे का प्रयास है।
पालि भाषा एवं साहित्य की समृद्ध परंपरा, त्रिपिटक साहित्य, बौद्ध संस्कृति और भारतीय ज्ञान-परंपरा को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से 17 सितम्बर से 1 अक्टूबर, 2026 तक पालि पखवाड़ा 2026 का आयोजन किया जाएगा। पखवाड़े के दौरान देशभर में विभिन्न शैक्षणिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक और जन-जागरण गतिविधियों के माध्यम से पालि भाषा के अध्ययन एवं प्रयोग को प्रोत्साहित किया जाएगा।
पालि केवल बौद्ध धर्मग्रंथों की भाषा भर नहीं है, बल्कि यह भारत की प्राचीन बौद्धिक एवं सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। तिपिटक सहित पालि साहित्य में दर्शन, नैतिकता, मानव जीवन, समाज और ज्ञान की ऐसी समृद्ध परंपरा सुरक्षित है, जिसका भारतीय इतिहास और संस्कृति के अध्ययन में विशेष महत्व है। पालि पखवाड़ा इसी विरासत को नई पीढ़ी से जोडऩे का प्रयास है।

17 सितम्बर से शुरू होगा कार्यक्रमों का सिलसिला
पालि पखवाड़े की शुरुआत 17 सितम्बर को विश्व पालि गौरव दिवस के अवसर पर होगी। इसी दिन देवमित्त अनागारिक धम्मपाल जयंती से संबंधित कार्यक्रम भी आयोजित किया जाएगा।
इसके बाद 18 सितम्बर को धम्मलिपि एवं पुरातत्त्व जागृति विमर्श, 19 सितम्बर को अशोक धम्मपद संगायन तथा 20 सितम्बर को पालि स्पर्धा कार्यक्रम आयोजित होगा।
21 सितम्बर को बौद्ध संस्कृति प्रबोधन पर्व और 22 सितम्बर को बाल पालि पर्व के माध्यम से बच्चों एवं युवाओं को पालि भाषा तथा बौद्ध सांस्कृतिक विरासत से जोडऩे पर जोर दिया जाएगा।
23 सितम्बर को प्रतिभा सम्मान समारोह तथा 24 सितम्बर को पालि तिपिटक संगायन पर परिचर्चा आयोजित की जाएगी। वहीं 25 सितम्बर को विचार-गोष्ठी के माध्यम से पालि भाषा और उससे जुड़े विभिन्न विषयों पर विचार-विमर्श होगा।
व्याख्यान और संगोष्ठियों से होगा ज्ञान का आदान-प्रदान
पखवाड़े के दूसरे चरण में 26 और 27 सितम्बर को व्याख्यान एवं संगोष्ठियों का आयोजन किया जाएगा। इन कार्यक्रमों में पालि भाषा, साहित्य, तिपिटक, बौद्ध दर्शन तथा भारतीय ज्ञान-परंपरा से जुड़े विद्वानों और विशेषज्ञों के विचार सामने आएंगे।
इसके बाद 28 सितम्बर को पालि तिपिटक महोत्सव, 29 सितम्बर को पुण्यानुमोदन कार्यक्रम में आचार्य सत्यनारायण गोयन्का स्मरणांजलि और 30 सितम्बर को पालि संगोष्ठी आयोजित होगी। पालि पखवाड़े का समापन 1 अक्टूबर को संगोष्ठी, समापन एवं पुरस्कार-वितरण कार्यक्रम के साथ होगा।
पालि को केवल पढऩे नहीं, बोलने की पहल
पालि पखवाड़े का उद्देश्य पालि भाषा को केवल विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों अथवा बौद्ध विहारों तक सीमित रखना नहीं है। इसके माध्यम से आम लोगों, बच्चों, युवाओं, शिक्षकों और पालि-प्रेमियों को भी इस प्राचीन भाषा से जोडऩे का प्रयास किया जाएगा।
इस अभियान का संदेश स्पष्ट है—
पालि सीखें – पालि सिखाएँ – पालि बोलें, घर-घर पालि — जन-जन धम्म।
सभी वर्गों से सहभागिता का आह्वान
पालि पखवाड़ा 2026 को व्यापक जन-अभियान का स्वरूप देने के लिए भिक्षु-संघ, बौद्ध संस्थाओं, शिक्षकों, विद्यार्थियों, पालि-प्रेमियों और धम्मानुरागियों से सक्रिय सहभागिता का आह्वान किया गया है।
अपने-अपने स्तर पर पालि पाठ, व्याख्यान, परिचर्चा, संगोष्ठी, प्रतियोगिताएं, सांस्कृतिक कार्यक्रम और जन-जागरण गतिविधियां आयोजित कर इस अभियान को मजबूत किया जा सकता है।
पालि भाषा के संरक्षण और प्रसार का यह प्रयास केवल एक भाषा को बचाने का अभियान नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन ज्ञान-परंपरा, बौद्ध साहित्य और सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बन सकता है।


















